*मोहरा खुद को राजा समझ बैठा है!*
संपादकीय | अजय नौटियाल
एडिटर-इन-चीफ, सुनिए सरकार
सियासत को समझने के लिए कभी-कभी संविधान की किताब से ज्यादा शतरंज की बिसात समझना जरूरी हो जाता है। क्योंकि राजनीति में हर चेहरा खिलाड़ी नहीं होता और हर ताकतवर दिखने वाला व्यक्ति वास्तव में ताकतवर नहीं होता। कई बार जिसे अपनी चाल का भरोसा होता है, वह किसी और की बिसात पर सिर्फ एक मोहरा होता है।
फिल्म मिर्जापुर का वह संवाद याद आता है- “जब कुर्बानी का वक्त आता है, तो महाराज और राजकुमार की कुर्बानी नहीं दी जाती… सिपाही की दी जाती है।”
फिल्मी संवाद है, लेकिन राजनीति और सार्वजनिक जीवन की हकीकत को समझने के लिए इसकी चोट बहुत गहरी है।
आज स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़े विवाद में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जंतर-मंतर की घटना में क्या हुआ, किसने क्या कहा और किसके खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई होगी। इन सवालों का जवाब जांच और कानून देगा। सवाल इससे बड़ा है- आखिर वह राजनीतिक ताकत थी क्या, जिसके भरोसे कोई व्यक्ति खुद को इतना सुरक्षित समझने लगे कि बड़े-बड़े नामों को अपना ‘बड़ा भाई’ बताने लगे?
स्वतंत्र भारद्वाज के एक वायरल इंटरव्यू में कई राजनीतिक नामों का जिक्र सामने आया। इनमें केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का नाम भी था। उन्हें अपना ‘बड़ा भाई’ बताए जाने की बात सामने आई। लेकिन जब विवाद बढ़ा तो चिराग पासवान ने साफ तौर पर दूरी बना ली। स्वतंत्र भारद्वाज के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई और उनके नाम के गलत इस्तेमाल पर आपत्ति जताई।
बस यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। जिस नाम को ढाल समझा गया था, वही नाम अब शिकायत का हिस्सा बन गया। यही राजनीति का कड़वा सच है।
तस्वीरें रिश्ते का प्रमाण नहीं होतीं। मुलाकातें संरक्षण की गारंटी नहीं होतीं। किसी बड़े नेता के साथ खड़े होने से कोई व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं हो जाता।
लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में भ्रम बहुत तेजी से बनता है। एक तस्वीर वायरल होती है। उसके नीचे कुछ शब्द लिखे जाते हैं। फिर वही शब्द पहचान बन जाते हैं। पहचान से प्रभाव पैदा होता है और प्रभाव का भ्रम धीरे-धीरे इस विश्वास में बदल जाता है कि अब कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहीं गलती होती है।
किसी नेता का नाम आपकी ढाल नहीं है। किसी मंत्री से पहचान आपका लाइसेंस नहीं है। किसी ताकतवर व्यक्ति की छत्रछाया आपका कानूनी कवच नहीं है। कानून को न ‘बड़ा भाई’ पता होता है, न ‘छोटा भाई’। कानून को सिर्फ तथ्य और सबूत पता होते हैं।
आज की राजनीति में यह बात खास तौर पर युवाओं को समझने की जरूरत है। सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि हासिल करना आसान कर दिया है, लेकिन प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा में जमीन-आसमान का अंतर है। फॉलोअर्स की संख्या और सामाजिक विश्वसनीयता एक चीज नहीं है। कैमरे के सामने आत्मविश्वास और वास्तविक जीवन में जिम्मेदारी भी एक बात नहीं है।
और यहीं फिर मिर्जापुर का वह ‘मोहरा’ सामने आता है। मोहरा तब तक खुश रहता है, जब तक उसे लगता है कि वह राजा की बिसात पर राजा की मर्जी से चल रहा है। उसे लगता है कि राजा उसके पीछे है। उसे लगता है कि उसकी चाल में ताकत है। लेकिन शतरंज का नियम बहुत साफ है- राजा को बचाने के लिए मोहरा आगे किया जा सकता है, लेकिन मोहरे को बचाने के लिए राजा हमेशा आगे नहीं आता।
इसलिए अगली बार जब कोई अपने साथ किसी बड़े नाम की तस्वीर दिखाकर इसे अपनी ताकत और खुद को कानून से स्वतंत्र बताए, तो सिर्फ तस्वीर मत देखिए।
उससे बस इतना पूछिए कि वह बिसात पर खड़ा है… या बिसात चला रहा है? क्योंकि राजनीति में सबसे खतरनाक भ्रम यही है कि मोहरा खुद को राजा समझ बैठा है।
